रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-धरा
विधा-कविता( मुक्त छंद)
मेरी धरती,मेरी वसुन्धरा,
शस्य-श्यामल कानन हैं,
हरे खेत हैं मखमली धरा।
बर्फ की रजत चुनरी ओढ़े,
पर्वतों पर काली घटाएंँ हैं,
फूलों की वादियों की छटा।
सुनहरी धान की बालियाँ मुकुट,
रत्न, खनिज संपदा गहना है,
संस्कृति गले का हीरे का हार।
नैसर्गिक झरने,ताल ,नदियां
झर-झर कल-कल बहती धार
जिसकी अनुपम शोभा अपार।
स्वर्ग- सी सुंदर इस धरा को,
कई वीरों ने दिया है अपना लहू,
शत् बार नमन धरा को कहूंँ।
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