Tuesday, March 23, 2021

श्वेता सिंह क्षत्रीय जी की रचना

रचियता - श्रीमती श्वेता सिंह क्षत्रीय
जिला - जाँजगीर चाम्पा (छ ग)
विषय - धरा


हे वसुन्धरा तेरी गाथा कहाँ से सुनाऊ,

जी करता है तेरी चरणों में समर्पित हो जाऊ।

तेरी पावन धरा में बहे नदियाँ हजार,

कितना अलौकिक है माँ तेरा श्रृंगार।

समुन्दर की गहराइयां दिल को छू जाती,

उससे उठती लहर कितना मनभावित।

जी करता है तेरी सुंदरता बस निहारते जाऊ,

हे वसुन्धरा तेरी गाथा कहाँ से सुनाऊ।।



संध्या की ढ़लती सूरज, माँ तेरे मष्तक की बिंदिया,

रात की चाँद तेरे बच्चों के लिए लेकर आये निंदिया।

हे धरती माँ तेरी हरी-हरी आँचल के पीछे छिप जाऊ,

हे वसुन्धरा तेरी गाथा कहाँ से सुनाऊ।।



भोर होते पंछियों की चहचहाहट सुनाई पड़ती है,

तेरी धरा में बिखरे ओस की बूंदे मोतियों सा दिखाई देती है।

ताजी हवा, शीतल छाया पहले जैसा कहा से लाऊ,

हे वसुन्धरा तेरी गाथा कहाँ से सुनाऊ।।



हे जननी तेरी ममता की लीला अपार,

जात पात न देखे तुझे तो हर किसी से प्यार।

तेरी ही गोद में रहकर तुझे ही गन्दा करते हैं,

तेरी जंगल को नष्ट कर अपना स्वार्थ पूरा करते हैं।

समझ नहीं आता माँ तेरी कर्ज कैसे चुकाऊ,

हे वसुन्धरा तेरी गाथा कहाँ से सुनाऊ।।।...

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