रचनाकार - रीता चटर्जी
स्थान -खोंगापानी ,कोरिया
छत्तीसगढ़
दिनांक 23/3/2022
विषय- धरा
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धन-धान्य की परिपूर्ण से
धरा की छटा अनुपम
प्रकृति को गोद में लेकर
सहते हैं हर बोझ स्वंय।
कहीं हरियाली,कहीं पर्वत
कहीं सरिता की कल-कल नाद
कहीं मैदान, कहीं घाटी,
घने वनों से श्रृंगारित आबाद।
मां के रुप में पूज्य है
न किसी से कोई शिकायत,
धरा की सहनशक्ति अतुल्य
धरे कपाल में करते नाज।
कण-कण मे है अनमोल रत्न
देने में सदा तत्पर,
न चीखती,न ही रोती
चाहे मानव चीरता बारम्बार।
वक्त अभी भी है सम्भालो
विनाश की इस लीला को,
धरती माता कहे पुकार
बचालो तीनों लोकों को।
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