जिला -रायपुर छतीसगढ़
विषय-व्रीहि
विधा-छंदमुक्त कविता
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देखते ही देखते, उम्र तमाम हो गयी|
जो राड़ी थी, अब वो बाँझ हो गयी|
अभी तो सुबह हुई ,अभी उजाला हुआ,
ये कैसे हो गया जो, जिंदगी में साँझ हो गयी|
मत पूछ बंजरों का दर्द,किंजरो की तरह,
कल थी जो खास, आज वो आम हो गयी|
अपने ही मोहल्ले में, हुई है बेइज्जत,
अपने ही घर मे ,मुनियाँ बदनाम हो गयी|
इतराती है व्रीहि, अपनी बालियों के साथ,
चिढ़ाती है उसे,देख मेरी तो धान हो गयी|
इमारती नहीं, वो लकड़ी जलाऊ होती है,
कल तक थी जो मालकिन, आज गुलाम हो गयी|
जिंदगी के नियमों में ,इंसानियत शर्मसार है,
अमित जिंदगी भी अब, मौत का पैगाम हो गयी|
अमिताभ कुमार दीवान
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