Monday, March 1, 2021

उर्मिला सिदार कृत आलेख- कानन

रचनाकार - उर्मिला सिदार 
ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़ 
विधा - आलेख 
विषय-  कानन 
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                 *कानन*
कानन का अन्य पर्यायवाची शब्द है। वन, जंगल, अरण्य आदि। कानन प्रकृति का एक अभिन्न अंग है। कानन धरती की व्यवस्था बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान करता है। वन जो प्रकृति प्रदत्त अपने आप स्वस्फुर्ती विधि से उद्गमिता हुआ है। इसमें मनुष्य का कोई हाथ नहीं है। प्रकृति की पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में धरातल में 33% होना आवश्यक है। वर्तमान में 23% कानन शेष रह गए हैं। कानन की हृास से प्रकृति प्रभावित है प्रकृति के प्रभाव से मानव समाज भी प्रभावित हैं। आज हर मानव में घुटन, हर परिवार में टूटन, समाज में विघटन और प्रकृति में प्रदूषण व्याप्त है। जो समस्या का कारण है। सभी क्षेत्र में समस्याएं दृष्टय हैं। मानव के पास समस्या ही समस्या दिखाई दे रहा है। धरा की भविष्य संकट में है। इस संकट से उबरने के लिए प्रकृति की व्यवस्था को समझना होगा। आज जीव जंतु, पदार्थ, मानव की समझदारी में कमी यह सभी तथ्य समस्या को इंगित करता है। वन इन्ही व्यवस्था का एक भाग है। अतः हृासित वन की पूर्ति कैसे हो इस पर मानव को समीचीन विचार करने की आवश्यकता है। कानन मानव और पशु पक्षी, जीव जंतु का पोषण का आधार भी है। कानन की अभाव से प्रकृति की व्यवस्था बिगड़ चुकी है। इस बिगड़े कानन को कैसे आबाद किया जाए और धरती की व्यवस्था को बनाया जाए। इस पर मानव जाति को गंभीर सोचने की आवश्यकता है। ताकि इस हृास को  किस तरह विकास कर, आने वाले पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा जाए और समस्या के समाधान पा सके। कानन धरा का श्रृंगार है। वैभव है। अतः कानन के प्रति सकारात्मक सोच रहते हुए अपनी अपराध से मुक्त हो, कानन के आबाद करने में अपनी जिम्मेदारी निर्वहन करें।
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                          उर्मिला सिदार
                     रायगढ़ छत्तीसगढ़

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