Monday, March 1, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- कानन

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कानन
विधा-कविता (मुक्त छंद)

कानन आश्रय दाता थे,
वनस्पतियों,वनोपजों,
वन्यजीव व मनुष्य के ।

कानन में स्थित पहाड़
अपनी  ही वीरानी देख,
रो रहे हैं दहाड़ मारकर।

नदियों के सूख गये जल
जलीय जीव तड़पते रहे
चुल्लू भर पानी के लिए ।

भालू,लोमड़ी,बंदरों के झुंड
भटकते रहे भूख से व्याकुल
 दर बदर शहर के गलियों में ।

कानन अपलक देखता रहा,
 पेड़ों की  अंधाधुंध कटाई,
  आश्रित जीवों का क्रंदन।

कानन अब कानन नहीं रहा
 सिर्फ समतल भूमि बन रहा,
औद्योगिकीकरण की चाह में ।

मीराआर्ची चौहान
कांकैर,छग
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