जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कानन
विधा-कविता (मुक्त छंद)
कानन आश्रय दाता थे,
वनस्पतियों,वनोपजों,
वन्यजीव व मनुष्य के ।
कानन में स्थित पहाड़
अपनी ही वीरानी देख,
रो रहे हैं दहाड़ मारकर।
नदियों के सूख गये जल
जलीय जीव तड़पते रहे
चुल्लू भर पानी के लिए ।
भालू,लोमड़ी,बंदरों के झुंड
भटकते रहे भूख से व्याकुल
दर बदर शहर के गलियों में ।
कानन अपलक देखता रहा,
पेड़ों की अंधाधुंध कटाई,
आश्रित जीवों का क्रंदन।
कानन अब कानन नहीं रहा
सिर्फ समतल भूमि बन रहा,
औद्योगिकीकरण की चाह में ।
मीराआर्ची चौहान
कांकैर,छग
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