संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ. ग.)
विषय-सरो
दिनाँक-26.02.21
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*सरो*
ऊँचे पहाड़ों का वक्ष फाड़ कर
सरो विटप करें धरती का श्रृंगार।
प्राणवायु देते जग को हरदम,
ऐसे सुंदर अनुपम वृक्ष उदार।
पर्वतों के ऊपर निर्निमेष गगन को,
ताकते रहते अक्सर सागर पार।
गगनचुंबी पेड़ बर्फीले धवल चादर
का हृदय से करते रहते आभार।
हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर,
जग को लालायित करते वृक्ष अपार।
सरो वृक्ष शीतल छायादार,
ऊपर वृक्ष होता छतनार,
धरा का करता रहता
अद्भुत रूप साकार।
सौंदर्य नयनाभिराम होते
हर पर्वत का द्वार,
पेड़-पौधे करते रहते सदा
मानव जीवन पर उपकार।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,( छ.ग.)
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