जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- सरो
विधा-कविता (मुक्त छंद)
बनझाऊ के बंदनवार बने,
सजा मेरा उपवन प्यारा।
शिवजी के जटाओं- सा,
तांडव करते लगता न्यारा।
वन की शोभा सरो बनी है,
उपवन उससे ही सजी है ।
लहराती और बलखाती है,
सात्विक जीवन करती है।
सरो वृक्ष की बात निराली,
क्यारी-क्यारी है इठलाती ।।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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