जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - खिलौना
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " खिलौने वाला "
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खिलौने वाला देखो आ रहा है।
बच्चों की खुशियाँ साथ ला रहा है।
गली-गली आवाज लगा रहा है।
डमरु अपनी बजा जा रहा है।।
हाथी,घोड़ा,रेलगाड़ी और हवाईजहाज़ है।
मोबाइल भी करता छइंया-छइंया आवाज है।
भालू,हिरण,शेर साथ अपने ला रहा है।
खिलौने वाला देखो आ रहा है।
याद है सबको ओ प्यारा बचपन।
खिलौने बिन नहीं लगता था जब मन।
ओ बचपन फिर याद आ रहा है।
खिलौने वाला देखो आ रहा है।।
रोते थे लेने को जिद करते थे।
बिन खिलौने एक पल भी नहीं रहते थे।
ओ आँसू,आँखें फिर गिरा रहा है।
खिलौने वाला देखो आ रहा है।।
बहनें नाराज हो जाती थी।
अच्छी खिलौने जब माँ मेरे लिए ले आती थी।
भाई, बहना को अपनी मना रहा है।
खिलौने वाला देखो आ रहा है।।
खिलौनों का खेल कितना सुहाना था।
बड़ी हसीन ओ लड़कपन का जमाना था।
अब बच्चों को मोबाइल सिर्फ भा रहा है।
खिलौने वाला देखो आ रहा है।।
खिलौने बेचकर खिलौने वाला,
बच्चों को खाना खिलातें है।
हम खरीदकर खिलौने को,
बच्चों को खुशियाँ दिलाते हैं।
रीत दुनिया की समझ मुझे नहीं आ रहा है।
खिलौने वाला देखो अब जा रहा है।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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