जिला -कोरबा, छ.ग.
विषय-आकाश गंगा
विधा--छंदमुक्त कविता
शीर्षक-आकाश गंगा
-------बहुत याद आते हैं वो दिन सुहाने ,
जब रागिनी आती थी लेकर ,आकाश गंगा के नजराने ।
बहुत याद आते हैं बचपन की वो मासूम अदाएं ,
जब देख टुटते तारों को , हर्षित होकर मांगा करते थे दुआएं।
बहूत याद आते हैं गांव की वो अविस्मृत नजारे,
जब चारपाई में स़ोते हुए ; भोलेपन से , गिनने की जहमत करते थे,
आकाश गंगा के असंख्य तारे ।
याद बहुत आते हैं गाँव की झिलमिल करते आकाश गंगा की वो चाँदनी रातें।
जिंदगी की भागदौड़ में, अधिक कमाने की होड़ में,
आ गए शहरों की कृत्रिम चकाचौंध में,
छोड़ दिए हम सुकून भरी वो चाँदनी रातें ।
संग आकाश गंगा के करते थे दुख-सुख की हम कितनी बातें ,
भूल नहीं पाएंगे कभी , वो झिलमिल करती तारों भरी रातें ।
स्मृति पटल पर संजो के रखे हैं; गांव के वो दिन सुहानें ,
जब रागिनी आती थी लेकर ,आकाश गंगा के नजराने ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
सम्पूर्ण बचपन की याद दिला आपने सच्ची वो दिन जबी तारे गिनते गिनते हम गिनती सिख लेते थे उर एक और आदत थी जहाज गिनने की कितनी जहाज गयी ऐसा लगता है अब असमान नही रहा हम लोगो के पास अब तो लोगो को रात्रि का गगन देखे कितने दिन हो जाता है पता न सब कैसे बदल गया
ReplyDeleteअविनाश सिंह
बहुत ही सुन्दर रचना है, समय तो वापस नहीं आ सकता लेकिन आप जैसे कवि हृदय लोगों की वजह से वह आज भी मानस पटल पर जिंदा है और अगे भी रहे यही शुभकामना है।
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