स्थान ----नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला ----जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---- कविता /आलेख
विषय ----आकाश गंगा
शीर्षक--- असंख्य तारे
देख रहा आकाश को , असंख्य तारे दिख रहे ।
छोटा सा ए मन, आज तक उनको गिन रहे ।
उंगलियां उन्हें दिखाता,लगते मुस्कुरा रहे ।
जैसा मैंने किया है, बस वही दुहरा रहे ।
सब आते जाते रात ,सूरज बस दिन रहे ।
दादी से कहानी सुनता,राजा रानी सुनता ।
हल खाट सप्त ऋषि , कोई कपड़ा बुनता।
नदी तालाब सागर झरने, सबको लिख रहे ।
झिलमिलाती चांदनी मुस्कुराती चांदनी ।
इधर चले उधर चले, गाए कोई रागिनी ।
कोई गिरते धरा पर जैसे सूखे पत्ते गिर रहे ।
कभी आकाश रहता खाली, धीरे धीरे भरता ।
नैन घुमा घुमा देखो,मन को सब है मोहता ।
उनके बीच को जाओ,लगे हमको खींच रहे ।
सुनो चांद छोटे छोटे , वहां होता रहता है ।
सुनो चांद बड़े बड़े ,वहां होता रहता है ।
छोटा बड़ा होना,ये राज नहीं सीख रहे ।
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