Friday, February 5, 2021

गिरधारी लाल चौहान की रचना- आकाश गंगा

नाम---- गिरधारी लाल चौहान
स्थान ----नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला ----जांजगीर-चांपा /छत्तीसगढ़
विधा---- कविता /आलेख
विषय ----आकाश गंगा
शीर्षक--- असंख्य तारे

   देख रहा आकाश को , असंख्य तारे दिख रहे ।
   छोटा सा ए मन, आज तक उनको गिन रहे ।

उंगलियां  उन्हें दिखाता,लगते  मुस्कुरा रहे ।
  जैसा मैंने किया है, बस वही  दुहरा रहे ।
सब आते जाते रात ,सूरज बस दिन रहे ।

दादी से कहानी सुनता,राजा  रानी सुनता ।
   हल खाट सप्त ऋषि ,  कोई कपड़ा बुनता।
   नदी तालाब सागर झरने,  सबको लिख रहे ।

    झिलमिलाती चांदनी मुस्कुराती चांदनी ।
     इधर चले उधर चले, गाए कोई रागिनी ।
    कोई गिरते धरा पर जैसे सूखे पत्ते गिर रहे । 

कभी आकाश रहता खाली, धीरे धीरे भरता ।
नैन घुमा घुमा देखो,मन को सब है मोहता ।
उनके बीच को जाओ,लगे हमको खींच रहे ।

सुनो चांद छोटे छोटे , वहां होता रहता है ।
सुनो चांद बड़े बड़े ,वहां होता रहता है ।
 छोटा बड़ा होना,ये राज नहीं सीख रहे ।

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