Monday, February 8, 2021

कांकेर से मीराआर्ची चौहान की रचना- प्रस्तर

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-प्रस्तर
विधा-कविता (मुक्त छंद)

आत्मविश्वास की क्यारी में,
 मेहनत के बीज बोना है ।

पसीना बहाये इंसां धरा पर
 मिट्टी बन जाती सोना है ।

तपिश धरा की झुलसा देती
हरीतिमा गर कम हो तो।

मन की दरिया में प्रवाह कैसे,
बुद्धि प्रस्तर हो जाये तो।

मरुभूमि की रेत भरी राह पर,
नीर बहे वो काम कर जायें।


 संकल्पित मन  से श्रम करके,
  प्रस्तर पर हरी घास उगायें।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग

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