जिला-कोरबा, छ.ग.
विषय-प्रस्तर
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक- पत्थर
-------जीवन यहाँ सुगम नहीं है ,
बन पत्थर सहना पड़ता है; दुनियाँ की आपा धापी को।
सुख यहाँ आसान नहीं है ; कौन नहीं सुख चाहेगा ,
हेतु सुगम सुख पाने को ; बन पत्थर सहना पड़ता है,
धूप तपिश और पानी को ।
यह सच है , सफलता का शिखर हर कोई चाहे ; कौन इसे नहीं चाहेगा ,
बन पत्थर श्रम करना पड़ता है,
हर मंजिल हासिल करने को ।
कुछ बन पाना आसान नहीं है,
स्पर्धा की इस दुनियाँ में ,
पत्थर को भी चुना जाता है महल,प्रसाद बनाने को ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
बहुत सुंदर कविता, जीवन कितना कोमल होता है पर उसे अपनी मंजिल तक पहुंचने तक पत्थर बनना पड़ता है। इसीलिए शायद ईश्वर को पत्थर में ढुंढा जता है।
ReplyDeleteपत्थर सा अडिग पत्थर सा साहसिक बनना पड़ता है तभी इंसान पत्थर पर विराजे पत्थर के रूप में विशाल भगवान के दर्शन कर पाता है।पत्थर के समान यदि इंसान बन जाये तो उसका जीवन भी सुखमय हो जाता है। पत्थर एक ऐसा प्रतीक है जो कठिनाइयों को सहन करने की क्षमता देती है।यह हमें जीवन मे भगवान के दर्शन भी पत्थर के रूप में कराती है
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