स्थान- तमनार, जिला/ रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-दोहा
शीर्षक-हलधर
🔅 हलधर🔅
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धरती फसलो से भरे,खुश हैं पालनहार।
भाग्य विधाता हैं सुनो,करलो जय जयकार।।
स्वेद रक्त निज सींच कर,बोते अन्न किसान।
रोटी लाते नित धरा ,लड़ पर्वत चट्टान ।।
जलते सूरज ताप में,बुझा उदर का आग।
सबको देते मोद हैं,लेकर गम का भाग।।
बारिश हो या गर्जना,चाहे चले समीर।
रोके चाहे हिम शिखा,चलते कृषक अधीर।।
फेरा लेकर खेत का,कीचड़ मिट्टी छेड़।
देकर ममता लाड़ जी,सींच पसीना पेड़।।
किस्मत बोते खेत पर,धरती से है प्यार।
भूखे प्यासे ही रहे,बैठ फसल भंडार।।
हंसते गाते हैं मृदा,देख कृषक का पाँव।
खुश हो जाते हैं फसल,पाकर ममता छाँव।।
अन्न विधाता जान कर,करना जी उपकार।
भोले भाले जानकर,करना मत लाचार।।
रखवाले है मनुज के,वसुंधरा के लाल।
कंटक पत्थर से लड़े,चाहे पद हो छाल।।
बन्द करो अन्याय तुम,छीनो मत अधिकार।
देख कृषक के आंख से,दृगजल बहता धार।।
सुनलो हलधर पीर को,हृदय करे चीत्कार।
करे अन्न का दान जो,करते हो धुत्कार।।
पर्वत पत्थर तोड़ कर,नीर बहा दे थार।
वसुन्धरा के वीर को,दिये शूल का हार।।
हरियाली भी रो दिये,देख कृषक का हाल।
कीमत अब पहचान लो,छोड़ो चलना चाल।।
मौलिक रचना
अजय पटनायक,
Superb
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