जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- कविता
विषय- तरकीब
शीर्षक- देखो
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तरकीब बदलती तकदीर देखो,
कटोरा पकड़ा हुआ अमीर देखो ।
झूठी लगती संप्रभुता व अखंडता,
अखण्ड भारत में नए-नए कश्मीर देखो ।।
लोलुपता में बिकता ज़मीर देखो ।
सलाखों सी कर्तव्यों की जंजीर देखो ।
धर्मांधता की लड़ाई कब थमेगी,
बीच मझधार में रोता आज कबीर देखो ।।
नालियों में बहता पावन नीर देखो ।
पकवानों में विलुप्त होता खीर देखो ।।
ऐश-ओ-आराम ने मेहनत छीन ली,
छोटी सी रोग से रोगी होता शरीर देखो ।।
वृक्ष विहीन तपता हुआ राहगीर देखो ।
धर्म की बोली लगाता धर्मवीर देखो ।।
सदियों से अभिशाप रही दहेज,
बेटी खातिर पिता को बनते अधीर देखो ।।
शब्दांशों से घाव होता गंभीर देखो ।
कटु वचनों का अकाट्य तीर देखो ।
किस-किस से प्यार करें साहब,
सब में कोई रांझा तो कोई हीर देखो ।।
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स्वरचित मौलिक रचना-
गुलशन खम्हारी 'प्रद्युम्न'
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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