सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-कविता
विषय-खिलौना
बाल-सुलभ मन मचल उठता
देख खिलौने बाज़ारों में
माँ-बाप से जिद करता
फरमाइशों की झड़ी लगता
मीठी झिड़की लगा ,पूरी कर देते
मांगे अपनी लाडलों की
किस्मत सबकी एक सी ना होती
ललचाई नज़रों से देख खिलौने
जब्त कर जाते चाहत को
माँ-बाप की बेबसी को
अपना तकदीर मान लेते
खिलौने वाले हाथों में
कुल्हाड़ी ले पिता की हाथ बटाते
कियूं है इतनी असमानता?
बाल मन की ये विवशता
मासूम,कोमल हाथों में
पड़ी गांठो की दास्तां
किताब-कॉपी, ले स्कूल जाने वाले,
खेल -खिलौने ले खेलने वाली उमर में
बाल-श्रमिकों की हक छिनती
साम्यवादी व्यवस्था।।
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