जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-खिलौना
विधा-कविता (मुक्त छंद)
तरह-तरह के खिलौने को पाकर,
खिलौने में बच्चे खुशियाँ
तलाशते ।
हाथी-घोड़ा ,बंदर और भालू
इतराते ,
गुड्डा-गुड़िया बनकर दुल्हन
शरमाते।
हिरनी कुलांचे भरती हर पल
मचलती,
मोरनी नाँचने को देखो हर दम
तरसती।
खिलौने के खेल बड़े ही निराले
लगते,
बड़े पचपन के बचपन के लिए
तरसते ।।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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