जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - जंगल
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " हमारा जंगल "
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जंगल है हमारी अमूल्य संपदा।
प्राणवायु देती हम सबको सदा।
टिकी है दुनिया इसी के दम पे,
सार्थक सत्य बात यह है सर्वदा।।
देश तभी संपन्न है।
जब जंगल का धन है।
आॅक्सीजन का है मुख्य स्त्रोत,
जैसे वन अमेजन है।।
रक्षक बनो भक्षक नहीं,
पेड़-पौधे हम सबको लगाना है।
ग्लोबिंग वार्मिंग से इस दुनिया को,
आग का गोला बनने से बचाना है।।
जंगल की गोद में नदी पहाड़।
पशु-पक्षी और शेर ही दहाड़।
झर-झर गाती गीत झरनें,
फल-फूल और वृक्ष ताड़।।
जंगल आदिवासियों का घर-द्वार है।
सिर में न प्रदूषण का भार है।
मस्त रहते अपने जीवन में ओ,
वही जनता और खुद ही सरकार है।।
प्रण करें आओ आज हम,
पेड़-पौधै खूब लगाएंगे।
अपनी पावन पुनीत धरा को,
हरे वृक्षों से अब सजायेंगे।।
जैसे पुत्र की रक्षा करते,
वैसे वृक्ष का करना होगा।
पुरी करते हर जरुरत उसकी,
अब पेड़ का भी ख्याल रखना होगा।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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