Thursday, February 11, 2021

मीरा आर्ची चौहान की रचना- जंगल

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-जंगल
विधा-कविता (मुक्त छंद)

जब देखती हूँ
   घने जंगलों को
      सोचती हूँ कौन?

 जी हाँ, कौन?
   उगाता है इन्हें।
      कौन देता है नीर?

कभी -कभी मेरा
   मन भी हो जाता
      घना -सा जंगल।

उग आते हैं विचारों
   और सपनों के कई
       बहुत बड़े-बड़े पेड़।

 मन के शिलालेख में
      लिख जाते हैं उन
           जंगलों की दास्तां।

मीराआर्ची चौहान
   कांकेर,छग
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