जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-जंगल
विधा-कविता (मुक्त छंद)
जब देखती हूँ
घने जंगलों को
सोचती हूँ कौन?
जी हाँ, कौन?
उगाता है इन्हें।
कौन देता है नीर?
कभी -कभी मेरा
मन भी हो जाता
घना -सा जंगल।
उग आते हैं विचारों
और सपनों के कई
बहुत बड़े-बड़े पेड़।
मन के शिलालेख में
लिख जाते हैं उन
जंगलों की दास्तां।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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