सुन्दगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-जंगल
आज बस्तियां हैं जंगल बनी हुई
पशु-प्रवृत्ति मानवों से भरी हुई
फैसला करना है मुश्किल बड़ा
चारों ओर है जंगल राज खड़ा
मानव आज स्वयं जंगल उजाड़ रहा
अपने ही हाथों अपनी चिता सजा रहा
सच जान के भी अनजान है बना हुआ
अपनी बर्बादीयों का सामान है जुगाड़ रहा
कल तक जो जंगल हमारी पहचान थी
पशु पक्षियों की आवाजों से थी गूंजती
सच ,शांति और दर्शन की थी जो स्थली
आज अट्टालिकाओं से अटी है वन-स्थली
आज जीवन घड़ी-भर की शीतलता को तरसती
एक पत्ते की छांव भी उसे ना मिलती
प्राकृतिक सम्पदाओं से भरी जंगल को खो चुकी
उमस भरी किरणों को तन मन में झेलती।।
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