Monday, February 15, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- बसंत

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-बसंत पंचमी
विधा-मुक्त छंद

 कोयल की कूक व गेहूंँ की बाली
 स्वागत में  है झूम रही हर डाली।

 पीले गेंदे संग सरसों की सर -सर
 बहती उन नदियों का कल -कल

  स्वर्ण बूंदों संग झरने का झर झर
  चिड़ियों की चहचहाहट का स्वर

हिलोरें लेता समीर ले आया बसंत
धरा ने श्रृंगार देख आ गया बसंत।

झूमते टेशु और पलाश सुर्ख लाल
मदमाती हुई  है कोयल की चाल।

बसंत पंचमी  वीणापाणि का दिन
आओ मनाऐ हम मां का जन्मदिन

 मीराआर्ची चौहान
  कांकेर,छग
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