जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-बसंत पंचमी
विधा-मुक्त छंद
कोयल की कूक व गेहूंँ की बाली
स्वागत में है झूम रही हर डाली।
पीले गेंदे संग सरसों की सर -सर
बहती उन नदियों का कल -कल
स्वर्ण बूंदों संग झरने का झर झर
चिड़ियों की चहचहाहट का स्वर
हिलोरें लेता समीर ले आया बसंत
धरा ने श्रृंगार देख आ गया बसंत।
झूमते टेशु और पलाश सुर्ख लाल
मदमाती हुई है कोयल की चाल।
बसंत पंचमी वीणापाणि का दिन
आओ मनाऐ हम मां का जन्मदिन
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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