जिला- कोरबा, छ.ग.
विषय- विरहिणी
विधा- कविता
शीर्षक-"सीता जी की विरह वेदना"
------कैसे बयाँ करुँ मैं निज मुख से !
विरहिणी सीता जी की विरह वेदना ।
मैं हूँ प्राणी इक अदना ।
कृस तन और ब्याकुल मन से ,
राह तके हैं नैन ।
पर्वत सा लगते हैं दिन,
काली अंधेरी रैन ।
दिवस गया तो निशा सताई ,
क्या करें जानकी माई ।
बाग के एक एक पत्ते से पूछे ;
क्यों नहीं आते मेरे रघुराई ।
बेचैन हृदय की तड़प यही है,
प्यासे दृग की प्यास यही है,
क्या उनको मेरी सुध नहीं आई !
क्यों नहीं आते मेरे रघुराई ।
अश्रुजल से भीगे परिधान,
उनके विरह का , कैसे करुँ बखान ।
प्रतिपल देतीं एक दुहाई,
क्यों नहीं आते मेरे रघुराई ।
सुखे अधरों में एक ही नाम ,
राम ! राम!! हे मेरे राम !!!
अशोक वृक्ष के नीचे बैठी ,
बोली जानकी माई -
हे अशोक वृक्ष! हैं पावक सम तेरे नूतन कोपल ,
देदे मेरे तन को तू ही अनल ।
आह भरी अब लेखनी मेरी ,
लिख कर विरह वेदना सीता जी की।
तब विरंचि भी द्रवित हुए ,
दुख सीता जी के हैं हरे ।
गिरी वृक्ष से मुद्रिका मनोहर ,
राम नाम अंकित थे जिस पर ।
विराम करुँ मैं लेखनी अपनी ,
प्रफुल्लित हुए अब श्री राम की सजनी।
।।इति।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
No comments:
Post a Comment