जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - विरहिणी
विधा - छंद मुक्त काव्य
शीर्षक - विरह व्यथा
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// विरह व्यथा //
मेरे स्वामी प्रियतम मुझसे ,
मिलने को कब आओगे ?
मैं विरहिणी राह देखती ,
कब तक यूँ तड़पाओगे ??
कई जन्मों से भटक रही हूँ ,
चैन कभी ना पाऊँ रे ।
विरहाग्नि की तपन सताये ,
कहाँ खोजने जाऊँ रे ??
तुझ बिन नैना सावन भादो ,
कुछ भी नही सुहाती है ।
काया सूखे पत्ते जैसे ,
याद तुम्हारी आती है ।।
लोक लाज निंदा को छोड़ी ,
तेरे कारण मैं नारी ।
शबरी मीरा द्रौपदी जैसी ,
आई मैं भी शरण तुम्हारी ।।
अब तो दरश दिखा दे जल्दी ,
मेरे गिरधर प्रभु पिया ।
ना जीती हूँ ना मरती हूँ ,
विरह व्यथा बेहाल किया ।।
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नोट - भगवान के विरह में भक्त की पुकार है । वास्तव में पुरुष तो केवल एक ईश्वर ही है । बाकी सब स्त्रियाँ है और यही भाव भगवान को आकर्षित करती है । रचना मौलिक , स्वरचित एवं अप्रकाशित है ।
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