मु.-लुकाउपाली छतवन
जि. -बलौदाबाजार-भाटापारा
विषय-बसंत पंचमी
विधा-कविता
शीर्षक-स्वागत ऋतु राज बसंत
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शिशिर अपने पूर्ण मदहोश यौवन पर,
हरियाली से आच्छादित ये धरा ये पर्वत पर।
मद से चूर मदमाया सकल जगत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।1।।
वन-उपवन फूलों से गंध-सुगंध की बौछार,
लताएँ वृक्षों से गले मिले हुए आते नजर।
प्रकृति की उल्लास-उमंग जन जन हर्षित,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।2।।
गंध-सुगंध समीर से तन-मन में मादकता,
अमृत-वर्षा करती चंद्र-ज्योत्सना की शितलता।
अमराईयो में कोयल छेड़ती सुर-संगीत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।3।।
टेसु की पंखुड़ियों के रंगों की फुहार,
आम्र पर सजी मंजरी के मदमस्त बहार।
पीली-पीली चूनरी ओढ़ ली सरसों की खेत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।4।।
नव-वधु बनी धरा घुंघट नील-अंबर,
मानों सज-सज से कर ली सोलह श्रृंगार।
प्रकृति की रसीली प्रेम नस-नस में लगी प्रीत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।5।।
फागुनवा के पहचान फाग गुलाल अबी। र,
बसंत फागुनवा के स्वागत में रहते अधीर।।
इस बसंत में सबका अल्हड मन बहकत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।6।।
नव-पल्लव जन-जन में उल्लास अपार,
हमारे जीवन में नव रस का हो संचार।
करे तहेदिल से बसंत ऋतु का स्वागत,
स्वागत - स्वागत ऋतु राज बसंत।।7।।
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