विषय -विरहिणी
रचनाकार -सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
शीर्षक -विरहण का दर्द
दर्द को पीते हुये जीना होता है।
अपने आंसुओ को छिपाना होता है।
विरह की आग ऐसी जिसमे तन -मन दोनों जला होता है।
ऐसा ही दर्द के साथ रहना होता है।
साजन तो जाते ही भूले।
ये मन उसको कैसे छोड़े।
बाँवरी हो जाती हूँ ।
ज़ब याद पिया की आती है व्याकुल होता है।
मन ज़ब याद उसकी सताती है।
साथ हँसे उन लम्हो को दिलमे बसा लेते है।
रोये कभी अकेले मे उसे छिपा लेते है।
जुदाई का दर्द ही ऐसा होता है।
जो पल पल मार जाता है।
किसी को भी विरह का दर्द ना हो।
ऐसा मन कहता है।
विरह का दर्द तो केवल विरहन ही जानती है।
जो पिया की याद मे तङप जाती है।
दर्द जो ऐसा होता है।
जो बहुत रुलाता है।
रचनाकार - सावित्री यादव "सावि "
बिलासपुर छ. ग.
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