विषय -मनियारी गोटी
विधा-कविता
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*मनियारी गोटी*
सब्बो लैका जुर मिल के,
बिनन मनियारी गोटी।
ओंटी ओंजरा मे धर के,
खेलन आँट डेहरी कोती।
छोटे बडे़ मन के गोठ,
आज ले सुरता आथे।
अब्बड़ नीक लागे भाखा बोली,
खाई खजाना के झोली।
अघावत ले खेलन मनियारी,
छोटे बडे़ के नई रहे चिन्हारी।
मन म कछु ऊँच नीच नई रहै,
सब्बो मया के संग खेलत रहै।
अब्बड़ सुरता आथे मोला,
नानपन के मयारु संगवारी।
नानपन के जिन्गी सिरागे,
कोन ल करव मै गुहारी।
ऐसे रहीन बचपन के संगवारी,
मन भर खेलन मनिहारी।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ
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