जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - सरो
विधा - छंद मुक्त काव्य
शीर्षक - सरो सुंदरी
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// सरो सुंदरी //
सरो सुंदरी बनझाऊ ,
जंगल की एक वनस्पति ।
उपवन की शोभा बढ़ाती ,
अनजानी सी जो लगती ।।
सीधी लम्बी और छतनार ,
वृक्षों की रानी माई ।
कोने में खड़ी मुस्काती है ,
नैसर्गिक सौंदर्य बढ़ाई ।।
पेड़ - पौधे तो बहुत हैं ,
लेकिन यह अलबेली ।
सबके मन को भानेवाली ,
जैसे गरम जलेबी ।।
लम्बे खुले जटाओंवाली ,
मानो कोई तपस्विनी ।
सुख - शांति की परछाई ,
सात्विक अनन्ददायिनी ।।
एशिया में पाई जाती ,
सरो वृक्ष है न्यारी ।
नाम प्रजाति भले अनेक ,
वन - उपवन की प्यारी ।।
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