Thursday, February 4, 2021

मीराआर्ची चौहान की रचना- विरहिणी

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *विरहिणी*
विधा-कविता (मुक्त छंद)

विरह की  आग में 
झुलसती तो होगी,
नेह की एक बूंद को
तड़पती तो होगी ।

वेदना की तपिश से
कुम्हला गई होगी ।
तानों की  वो सीकें
चुभती तो होगी ।

जाने कितने ताने
फांस बने होंगे ।
राहों में  भी कितने
जाल बिछे होंगे ।

मन तो जल बिन
मछली बनी होगी।
बिछुड़ कर कभी
सोचा भी उसने ।।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग

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