जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *विरहिणी*
विधा-कविता (मुक्त छंद)
विरह की आग में
झुलसती तो होगी,
नेह की एक बूंद को
तड़पती तो होगी ।
वेदना की तपिश से
कुम्हला गई होगी ।
तानों की वो सीकें
चुभती तो होगी ।
जाने कितने ताने
फांस बने होंगे ।
राहों में भी कितने
जाल बिछे होंगे ।
मन तो जल बिन
मछली बनी होगी।
बिछुड़ कर कभी
सोचा भी उसने ।।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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