Wednesday, February 3, 2021

कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- इम्तिहान

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
   संबलपुर,जिला-कांकेर,(छ.ग.)
       विषय-इम्तिहान
           दिनाँक-03.02.21
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              *इम्तिहान*

जिंदगी एक अजीब 
  इम्तिहाँ बन गई,
   बची-खुशी साँसे 
     अब मेहमां बन गई।

रंजोगम से भरी है 
   हमारी ये जिंदगी,
    खुशियाँ चार दिनों की
       चाँदनी बन गई।

दुनियाँ की तोहमतें 
  जीने नहीं देती,
     क्या बताएं जिंदगी एक 
        अनुत्तरीय प्रश्न बन गई।

बड़ी ख्वाहिशें थी,
  बेइंतहा उल्फत भी ,
    हम रँगे तुम्हारे रंग में ख्वाहिशें 
        देहरी पर दम तोड़ गई।

लम्हों और किश्तों से 
  जिंदगी की तुरपाई हुई,
     बातें अधर तक 
         आते-आते बेजुबां बन गई।

इम्तिहानों का दौर चला तो 
   सिर्फ ठोकरें मिली,
      चुनौतियों से लड़ते-लड़ते 
        जिंदगी सख्त शिला बन गई।

टूटना,बनना,गिरना,
  संभलना,उतार और चढ़ाव,
     यही तो इम्तिहाँ की 
         अब पड़ाव बन गई।

*व्याख्या*:-प्रस्तुत कविता में परीक्षा के 
            दौरान आने वाली विसंगतियों 
             का वर्णन किया गया है।

    नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)

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