रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय- विरहिणी ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक- विरहिणी ।
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●●{{••"" विरहिणी ""••}}●●
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जगत में विहरिणी की तपिश--
नारी वेदना को उभार देती,
मन ही मन में जलती रहती हैं ,
देख न पाये,दर्द कोई--।
एक रही सीता--
त्याग तपस्या में लीन,
हादसों -कष्टों को झेलती,
विरहिणी बन गई जिन्दगी ।
एक रही मीरा---
प्रेमरस भक्तिभाव में डूबी,
कहती-फिरती,मेरो तो गिरधार--
गोपाल,दूजो ना कोई,
हुई थी लीन,विरहिणी बन के ,
छोड़ दिया था,राजपाट व वैभवता ।
विरहिणी,मरीचिका बन दहन में,
प्यासी -प्यासी ,यादों में रहती,
पिया मिलन के इन्तज़ार में,
कभी हीर तो,कभी लैला बनी ,
सारे दुखःदर्दों को भूल,
निहारती दिन-रात सजल नयनों से।
पेट भरने की जरूरत--
पिया परदेशी बन जाता है,
मैं विरहिणी बन घर में रहती,
पहले रहता था,पत्रों का इन्तज़ार,
पर मैं अनपढ़ ,लिखी बात पढ़ न
पाती और लाज के मारे,पढ़ा न पाती।
भारतीय नारियाँ की व्यथा को,
लिखूँ मैं कैसे,वह कह भी नहीं पाये,
अपने मन की बात और भीतर ही भीतर घूँघट में घुंटती रहती,
कभी ऊफ नहीं करती थीं,
पर,समय बदला,समाज बदला,
विरहिणी घूँघट से बाहर आई --।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि विरहिणी के अंतर्मन के दर्द व प्यास का वर्णन किया है ।
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