सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-तरक़ीब
जिंदा है वो,
जो जीने की तरकीब जानता है
हालतों से लड़ना,
हौशलों को बुलंद करता है
देता नही है दोष
कभी भी तकदीर को
जो मिला है उसे
अपना नसीब मानता है
नई-नई तरकीबों से
तकदीर भी बदल सकता है
तरकीब अच्छी व बूरी दोनों ही हो सकती हैं
कोई परीक्षा के लिए खुद को तैयार करता है
तो कोई नकल कर चालाकी दिखाता है
जिसकी जैसी सोच वैसी ही
तरकीब निकालता है
जो जीने की कला सिखाये
वो तरकीब दे मेरे मालिक
जो गैरों को भी अपना बना लूं
उनके दुखों को भी अपना लूं
ऐसा तक़दीर दे मेरे मालिक।।
������ very nice
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