जिला--कोरबा, छ.ग.
विषय- पूर्वाग्रह
विधा--छंदमुक्त कविता
शीर्षक- नारी
मैं नारी हूँ, हाँ मैं इक नारी हूँ।
मैं पूर्वाग्रह नहीं रखा करती ,
समाज के ठेकेदारों से ।
मैं हर मंजिल हासिल करती हूँ ,
अपने हौसलों और संस्कारों से ।
मेरा पूर्वाग्रह कतई नहीं रहता ;
समाज मुझे. किसी. देवी का.दर्जा. दे ,
मुझे इल्म है समाज के मुंह देखी बातों का।
वर्ना क्या गर्भ से गिराई जाती ???
क्यों गर्भ में मेरा आवाहन नहीं होता ???
हाँ मैं इक नारी हूँ ।
अपने माँ -बाप की प्यारी हूँ ।
मैं गर्भ से निष्कासित होती हूँ क्योंकि
धूर्त समाज ने दहेज का मुंह सुरषा सा बना रख्खा है ।
क्यों न करुं मैं अपने मुंह अपनी ही बड़ाई --
मैं दो कुल की लाज बचाती हूँ ।
इसीलिए मेरा कर्जदार समाज,
मुझे देवी का दर्जा देते हैं ।
फिर भी वो मेरी अहमियत नहीं समझते हैं।
गर्भ में मेरी हत्या करने को विवश किया करते हैं ।
कोशिश कोई करे यहां ,
दहेजप्रथा समाज से हट जाए
तब देखेगी मेरी कौशल दुनिया ।
और मानव रुपी दरिंदों को कानून जकड़ कर खा जाए ,
तो मैं भी सुंदर सृष्टि का मनोहर रुप से वाकिफ हो जाऊँ।
और मैं भी समाज में अहम योगदान का सच्चा दर्जा पाऊँ ।
।।इति।।
" गोमती सिंह"
कोरबा, छ.ग.
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