सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-काव्य
विषय-विरहणी
विरहणी प्रेम में हारी हुई
निज शोक, संताप में ही
टूटी,बिखरी,उलझी हुई
प्रेम के पारावार में डूबी
निज प्रियतम की आस में
खोती आत्मसम्मान भी
निशदिन बरसत नैन
ज्यों हो पावस की रैन
अपलक निहारती रहती
व्याकुल और बैचेन
अश्रु भरे पलकों में
ना एक क्षण का चैन
देख विरहणी की दशा
चुप है नभ और धरा
वियोग की मारी वह
उर्मिला है या यशोधरा?
देती संदेश कण -कण को
कैसे समझाये मन को?
विरहाग्नि में जलती यों
ज्यों जलबिन मछली हो
बिखरे केशों की लटों में
श्रृंगार भी जैसे रूठे हों
बैठी विरह की आग में
ज्यों खुद को झुलसाती हो।
�� bahut sunder
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