जिला :- महासमुंद
विषय :- विरहिणी
विधा :- कविता
शीर्षक :- विरहिणी
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नैनो में है गंगा - जमुना,
दिल में खोने का गम है।
वादा किया था लौट आने का,
साजन वह आज बे-दम है।
हाथों से ना धूली थी मेंहदी,
धूल गई माथे की लाली।
विरह वेदना से व्याकुल है,
विरहिणी की यौवन की प्याली।
है गर्व से हुई छाती चौड़ी,
पर उर में देखो आग लगी है।
छोड़ गया है जीवन साथी,
नव दुल्हन देखो ठगी - ठगी है।
अभी - अभी आया था सावन,
करवट बदली है मौसम ने।
ज्यों पतझड़ का मौसम आया,
हरियाली खो गई उपवन से।
जाने कितने ख्वाब संजोए,
डोली चढ़ आई थी सजनी।
देख अर्थी को निज साजन के,
सुबक - सुबक रो रही विरहिणी।
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