जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- वो खपरा के छानी
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वो खपरा के छानी,
हमर पुरखौती के निशानी।
भुला के तइहा के रीत,
दुनिया ढलई घर के दीवानी।
वो माटी के लेवा के भिथी,
अऊ पर्रा छुई के लिपाई।
कारी रथिया ले लड़े बर,
जलावन संगी दियासलाई।
वो छत के बीच म दरबा,
अऊ दरबा म रहय कोठी।
अड़बड़ सुग्घर महकत रहे,
घर म गोबर लिपाय माटी।
समान रखे बर बने सुग्घर फुला,
माटी के चूल्हा शोभा बढ़ाय।
तटकत जेठ महिना म भी,
माटी के घर म ना घाम जनाय।
जम्मो बछर बरखा के पहली,
खपरा लहुंटई के सुग्घर रीति।
गेरु रंग म सजावट बर,
बनावन संगी सुग्घर आकृति।
ना सिमेंट लागे, ना सरिया संगी,
बस माटी के भिथी अऊ लखरी, खपरा के छानी।
सुग्घर संगीत सबके मन मोहय,
बरसे जब झर - झर पानी।
वो खपरा के छानी,
हमर पुरखौती के निशानी।
भुला के तइहा के रीत,
दुनिया ढलई घर के दीवानी।
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