Wednesday, January 13, 2021

बालोद से शैलेन्द्र चेलक की रचना- किसान

रचनाकार - शैलेन्द्र चेलक
पेंडरवानी , बालोद , छत्तीसगढ़
विषय - किसान
शीर्षक - मध्यमवर्गीय किसान

         मध्यमवर्गीय किसान
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भांति - भांति के अन्न को जो श्रम से उपजाता है ,
परिवार छोड़ रात - दिन खेतो में बीतता है ,
धरती को संवारता देता नये रूप में पहचान है ,
श्रमकण से सींचता धरा को हलधर किसान है ,
कर्ज का बोझ न सर से छूटे ,
अपनी व्यथा किसको ? सुनाए ,
भूख मिटाने भूखा ही जुते ,
फिर भी न सके वो भूख मिटाए ,
जिसके बलबूते अनाजों की मंडी सजी रहती है ,
वो कई दिन एक पहर क्यों? भूखा ही बिताता है ,
छप्पन -व्यंजन सजी रहती बड़े-बड़े होटलों में ,
कैसी ? विडंबना है इन्हें उपजाने वाले अक्सर भूखा ही सो जाता है ,
कई बार मौसम की मार से हुआ , असफल अभागा ,
थक गई धरा श्रम देखकर उसका,
पर श्रमशील न श्रम से भागा ,
हाड़ कपाते सर्दी में भी रैन बिताते जाग - जाग ,
दलहन - तिलहन उपजा कर वो ,
भर देते प्रकृति में अनुराग ,
प्रकृति की पावन प्रेम ही ,
परिणीति  तक ले जाता है 
असफलता को पीछे छोड़ किसान ,
धानी क्यारी लहराता है ,

            - - शैलेन्द्र चेलक - -

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