द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"मयारू किसान भइया"
विधा-तुकांत कविता(छत्तीसगढ़ी)
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मयारू मोर किसान भइया,
खेत जोंत के पछीना गिरइया।
जबर हे धन छाती तोर,
धान भुइयाँ म उपजइया।
अमर राहय जिनगी तोर,
सब ल सुख के अमरइया।।
पियास घाम बेरा कुबेरा,
नइ हस तंँय चिनहइया।
चिखला माटी म नहाथस,
आधा ओनहा पहिरइया।।
गोड़ तोर खोंड़रा हावय,
खोंड़हर खोंड़हर कमइया।
पानी के करथस अगोरा,
सरग बादर तंँय झंकइया।।
दुनिया के पोंसइया तँय,
जांँगर के नोहस पोंसइया।
लछमी के मानइया तंँय,
दाना दाना सकला करइया।।
जम्मों के भूख ल मेटाय बर,
माटी म पछीना गिरइया।
बड़का हावस भुँइया म,
पीरा तोर नइहे चिनहइया।।
मयारू मोर किसान भइया,
जम्मों पेट के आगी बुतइया।
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