जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - किसान
विधा - छंदमुक्त कविता
शीर्षक - " किसान के जिंदगी "
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अब्बड़ मेहनती सब किसान।
छंइया भूइंया के मोर मितान।
धरती माई के तैं हर शान।
खेत ल बनाबो अब सोना के खान।।
बंजर जमीन ल उपजाऊ बनाथे।
थकय घलो नइ दिन-रात कमाथे।
कोन मुहुँ ल करौं तोर गुनगान।
तोर महिमा हावय अब्बड़ महान।।
खेत जोंते के समय हर आगे।
नांगर संग पर्रूं बइला फंदागे।
हाथ में मुठिया अऊ नत्थी के कमान।
बने जागबे मोर सरना के धान।।
बंद-कचरा के खेत में भरमार हे।
कतक ल घलो निंदौं दुसरइया बार हे।
अँगरेजी दवाई माटी करथे नुकसान।
घुरुवा के खातू डालौ ग किसान।।
बेरा-कुबेरा ले किसान कमावत हे।
लकर-धकर नोनी के दाई आवत हे।
जम के भूख लागत हे जल्दी तैं ह लान।
बोरे-बासी संग गोंदली अऊ अथान।।
ऊपर भरोसा मोर खेती किसानी हे।
न नहर के सुबिद्धा न बोर के पानी हे।
किरपा करबे मोर भगवान।
देबे पानी-कांजी के सुग्घर वरदान।।
लागा बोरी करके खेती ल करें हंव।
मन करम से जतन ल करें हंव।
मत लेबे प्रभु तैंहर मोर परान।
आत्महत्या नइ हे मोर समस्या के समाधान।।
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मौलिक रचना ( स्वरचित )
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
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