महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक-"मल्लाह"
विधा-कविता (तुकांत)
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जीवन नैय्या हाथ तेरे,तु है खेवनहारा।
तुफानों का मूँह मोड़ा,लगाया किनारा।।
बचाकर बीच भंवर से,बना तु सहारा।
अजब है हुनर तुम्हारा,गजब पतवारा।।
हो…........
डोले डगमग नाव जब,समझा सम्हारा।
देख तब लगे अचरज, नाज़ुक नज़ारा।।
खेल होता घड़ी भर का,तूने तब उबारा।
कश्ती तेरी लगी घाट,तूने मंज़िल उतारा।।
हो….........
टकराया बड़ी तूफान से,संयमी अपारा।
चोखा नाप ली गहराई,हिम्मत नही हारा।।
चुनौतियाँ बड़ी-बड़ी,मौत को ललकारा।
पल कभी यह आया, ख़ुद को तु निहारा।।
हो…...........।
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