जिला - बलौदाबाजार (छत्तीसगढ़)
विषय - किसान
विधा - छंद मुक्त कविता
शीर्षक - मैं खेतिहर किसान हूँ
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// मैं खेतिहर किसान हूँ //
माटी पुत्र कहाने वाला ,
मैं खेतिहर किसान हूँ ।
ऋण में जीता ऋण में मरता ,
भारत की पहचान हूँ ।।
अपढ़ देहाती सीधा - सादा ,
सुख - संतोष ही पूँजी है ।
ठाट - बाट से कोसों दूर ,
तन पर एक लँगोटी है ।।
छोटी - सी कुटिया के वासी ,
मैं बापुरा नादान हूँ ।
ऋण में जीता.......।।१।।
थोड़ी सी जमीन है मेरी ,
पत्नी और दो बच्चे ।
माता - पिता की देखभाल ,
सब कुछ मेरे जिम्मे ।।
श्रम की पूजा करने वाला ,
मेहनतकश इंसान हूँ ।
ऋण में जीता.......।।२।।
हल - बैलों के साथ सबेरे ,
खेत जोतने जाता हूँ ।
फसल उगाता सींच पसीना ,
सबको अन्न खिलाता हूँ ।।
भूखा रहकर भूख मिटाता ,
धरती की संतान हूँ ।
ऋण में जीता......।।३।।
घोर गरीबी और महँगाई ,
सदियों से है निगल रहा ।
सेंठ जमीदारों से शोषित ,
मैं लाचार तड़प रहा ।।
मंदमति मैं भोला भाला ,
दुनिया से अनजान हूँ ।
ऋण में जीता......।।४।।
खुले हाथ देते रहना ही ,
मेरा शाश्वत धर्म है ।
त्याग और सेवा ही जग में ,
मेरा जीवन कर्म है ।।
जन्मभूमि की सदा सर्वदा ,
गाता मैं गुणगान हूँ ।
ऋण में जीता......।।५।।
माटी पुत्र कहाने वाला ,
मैं खेतिहर किसान हूँ ।
ऋण में जीता ऋण में मरता ,
भारत की पहचान हूँ ।।
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