कमबख़्त करोना ने
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कमबख़्त करोना ने,
हम सबको विवश कर गया ।
नतमस्तक हो गये इसके आगे,
फीका गणतंत्र दिवस हो गया।
न बैन्ड न जुलुस ,
न बच्चों की टोलिया।
न साहित्यिक न सांस्कृतिक ,
न जयहिन्द की बोलियाँ ।।
सब पर भारी पड़ा करोना,
सबको अपना वश कर गया।
नतमस्तक हो गये इसके आगे,
फीका गणतंत्र दिवस हो गया।।
हँसता मुस्कराता चेहरो गालों पर,
मास्क में तिरंगा दुबक गया ।
न किसी से कोई हाथ मिला सके,
सेनेटाइजर से हाथ महक गया।।
कहे नील चेलक बेजुबान मुंह से,
मेरा उत्साह तो सर्वस गया ।
नतमस्तक हो गये इसके आगे ,
फीका गणतंत्र दिवस हो गया।।
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