Thursday, January 7, 2021

कांकेर से मीराआर्ची चौहान की रचना- अश्क

रचयिता-मीराआर्ची  चौहान
जिला+कांकेर,छग
शीर्षक-अश्क
विधा- कविता (मुक्त छंद )

बहुत सहता है इंसान ,
कठोर व्यंग्य बाणो को।

 बहुत मेहनत करता है ,
 पर फल नहीं मिलता ।

भावनाएँ  शब्द नहीं,
अश्क कह जाते हैं ।

बहुत रोता है अंबर,
मगर तारे टूट जाते हैं ।

 अपनों से बिछड़ कर,
 कहीं छुप कर रोते हैं ।

कभी अपने लिए आंचल
अश्कों से भिगोते हैं ।

कभी देख दूसरे का दर्द
दहाड़ मार कर रोते हैं ।

पर देख पराया ‌दर्द रोती
हैं  जो हम दर्द आंँखें।

उन आँखों के बहते अश्क
आँसू  नहीं मोती हैं ।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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