जिला+कांकेर,छग
शीर्षक-अश्क
विधा- कविता (मुक्त छंद )
बहुत सहता है इंसान ,
कठोर व्यंग्य बाणो को।
बहुत मेहनत करता है ,
पर फल नहीं मिलता ।
भावनाएँ शब्द नहीं,
अश्क कह जाते हैं ।
बहुत रोता है अंबर,
मगर तारे टूट जाते हैं ।
अपनों से बिछड़ कर,
कहीं छुप कर रोते हैं ।
कभी अपने लिए आंचल
अश्कों से भिगोते हैं ।
कभी देख दूसरे का दर्द
दहाड़ मार कर रोते हैं ।
पर देख पराया दर्द रोती
हैं जो हम दर्द आंँखें।
उन आँखों के बहते अश्क
आँसू नहीं मोती हैं ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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