स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"अश्क़"
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अश्क़, मिले हैं इश्क़ में
निशानी की तरह
बहते हैं रोज आंखों से
पानी की तरह ।
अश्क,छुपाने से नहीं छुपते
जज्बातों के उभरते ही
छलक जाते हैं
पैमाने की तरह ।
अश्क़,याद में उनके जब
गिरते हैं गालों पर
पाकीज़ा नज़र आने लगते हैं
बारिश की बूँदों की तरह ।
हाले दिल बयां करती हूँ
किसी को अपना
तो मेरी हक़ीक़त भी
लगती है कहानी की तरह।
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