जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कहार
विधा-कविता (मुक्त छंद)
कहार हर बार बेटी को
विदा कर भावविभोर
होकर सिहर जाता ।
अब कार ही कहार है,
कहार के साथ भावना
विलुप्त हो रही अब।
बदल रही परंपरायें पुरानी
नहीं बदली तो बस दहेज
और दुल्हन की किस्मत ।
आज न पालकी है न कहार,
पुरानी रश्में हैं न मनुहार,
बदल गये वो रिवाज ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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