Tuesday, January 12, 2021

कांकेर से मीराआर्ची चौहान की रचना- कहार

रचयिता-मीराआर्ची चौहान
जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-कहार
विधा-कविता (मुक्त छंद)

कहार हर बार बेटी को
विदा कर भावविभोर
 होकर सिहर जाता ।

अब कार ही कहार है,
कहार के साथ भावना
 विलुप्त हो रही अब।

बदल रही परंपरायें पुरानी
नहीं बदली तो बस दहेज
और दुल्हन की किस्मत ।

आज न पालकी है न कहार,
 पुरानी रश्में हैं न मनुहार,
  बदल गये वो रिवाज ।

मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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