महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक-"रूह"
विधा-अश़आर।
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रूह मेरी जब से तेरी तलबग़ार हुई,
ख़ौफ़-ए जुदाई वाली ज़ार-ज़ार हुई।
ज़रा सा तेरा दीदार जो किया हमने,
बेचैनियाँ बढ़ी बेहद रूह बेक़रार हुई।।
साए में तेरी ज़ुल्फों के वक़्त गुज़रा,
समाँ हुआ सुहाना वो सुकूँ का पहरा।
लगा यूँ कि हमनें उम्र गुज़ारी सदियों,
तक़दीर से मेरी बदी की तक़रार हुई।।
जन्नत का नज़ारा देखा यहाँ हमनें,
रूह से रूह का मिलना देखा हमनें।
वादे हज़ार किये थे कसमें भी खाईं,
पहरा था सख़्त औ वक़्त से हार हुई।।
रहेगा अफ़सोस ज़िन्दगी भर हमको,
मुक़म्मल नहीं हुआ अपनाना तुमको।
क़ायनात से लड़ते रहे क़यामत तक,
रूसवाई तेरी मेरी रूह पर बेशुमार हुई।।
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