जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-संवादिका(छोटी चींटी)
विधा-कविता (मुक्त छंद)
न कभी रुकती, न कभी थकती,
साथ ही चलती,साथ में रुकती।
सहयोग को तत्पर,आगे ही बढ़ती
कभी न झगड़ती,आराम न करती
पंक्ति बद्ध हो कतारों में ही चलती,
सहकारिता की मिशाल है ये चींटी
सूचना तंत्र बहुत प्रबल है इनका।
संवादिका कहलाते हैं इस धरा में।
संग्रह करते भोजन के कण का ।
प्रेम और एकता का संदेश देते ।
लघु जीवन है प्रेरक हर एक काज
सदैव साहचर्य का करते आगाज।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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