स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता /ग़ज़ल
शीर्षक -"नज़्म"
****************************
कातिब की नज़्म सुनकर
जज़्बात ए तारीक ताज़ा हो गए।
नज़्म के हर अल्फ़ाज़ थे नायाब
कि जमात-ए-दिल कायल हो गए।
जुंबिशें नज़्म ने कुरेदा
कि हर ज़ख्म जवां हो गए।
दिले खुर्रम बयां कैसे करूं
लगा खंज़र और ज़िगर में उतर गए।
जफाये नज़्म देखो जनाब
हर ज़ालिम ज़हीर हो गए ।
नज़्म की तारीफ क़ुबूल फरमाइए
जर्रा-जर्रा नज़्म से तशरीफ़ हो गए।
No comments:
Post a Comment