संबलपुर, जिला-कांकेर, (छ.ग.)
विषय-नज्म,
दिनाँक-11.01.
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*नज्म*
दिल की गहराइयों से
भावनाएं नज्म बन निकलती है,
टूटे हुए दिल की
आवाज बन बिखरती है।
जब हिय उल्लसित होता
है,तब तरंगे है उठती,
सपने अल्फाज का रूप ले
गजल बन उठती है।
मन में लालसाएं शब्दों की
गहनता लिए उफान बनती,
प्रणय की कथा तब
कविता बन निखरती है।
नज्म सरल नहीं दिल के
दर्द को जब मथा है जाता,
अन्तर्मन की पीड़ा,नवनीत
संग घी बन पिघलती है।
संयोग-वियोग कसक के
एहसासों को बयाँ करती है,
रस,छंद,अलंकारों के
रूप में गढ़ चमकती है।
दिल में सुख-दुःख की
जब पराकाष्ठा,बढ़ती है
तब लेखनी शब्दों को बाँधने
निर्झरिणी बन मचलती है।
*व्याख्या*-प्रस्तुत कविता में भावनाओं की बाढ़ से नज्म बनने की बात कही गई है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर,(छ.ग.)
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