निवास-बायरन बाज़ार,रायपुर,छ.ग.।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा-छ्न्द मुक्त कविता ।
शीर्षक-"" अश्क "" ।
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°•°•°○☆||~""अश्क ""~||☆○°•°
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दर्द,शोक का--
मेल होते हैं अश्क--।
गम हो या खुशी हो---
कभी किसी के,
अश्क बरबस निकल ही,
पड़ते हैं ।
अपनों के बिछुड़ जाने का--
बेटी का शादी-विदाई में--
अश्क को नयनों में,
न जाने क्यूँ रोक पाना--
होता है यारों,कितना मुश्किल--।
किसी के दु:ख में--
दु:खी होना ही--
हमदर्दी कहलाती है ।
कभी-कभी भावुकता में भी--
अक्सर लोगों के--
सच्चे मन से अश्क,
छलक ही जाते हैं--।
धीर-गंभीर लोग---
ऊपरी तौर पर नहीं,
अन्दर ही अन्दर,मन से,
चुपचाप अश्क बहाते हैं,
जुबां से,कुछ लोग कहते हैं--।
इन्सा क्या,जानवर भी--
अपनों के बिछुड़ने पर,
उसके भी नयनों में,
अश्क दरक ही जाते हैं--।
अक्सर प्रेमी जोड़े--
बिछुड़ जाने पर--
गम भुलाने के लिए,
छुप-छुपकर अपने नयनों को,
अश्कों से भिगोते हैं--।
कुछ लोगों की आदत होती है--
कभी भी अनैतिकता को देख,
वे अक्सर,खून के आँसू पी जाते हैं,
ऐसी बातों को वो कभी भी--
बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं,
जमाने में,ऐसे लोग--
आज भी नजर आ ही जाते हैं--।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि जीवन में मानव हो या जानवर संवेदनशील होते हैं और उनके अश्क बरबस कभी न कभी छलक ही जाते हैं ।
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