स्थान ---नवापारा खुर्द /सक्ति
जिला--- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा--- कविता/ आलेख
विषय ---सायक
शीर्षक__ सायक दे दो हाथों में
मेरे हाथ में धनुष होता, साथ ही साथ सायक ।
मिटा देता इस पृथ्वी से, जितने भी है नालायक ।
एक बेटा अपनी मां से यह कह रहा ।
देखा मैंने आंखों से जो दृश्य रहा ।
धन्य है धन्य है वो मां बेटे दोनों ।
जिसकी जरुरत इस धरती को हमेशा रहा ।
इस धरा पर ऐसे ही, अनेकों है सुखदायक ।
जिस स्वर्ण मृग का राम के हाथों वध हुआ ।
उसमें सायक का भी हाथ है ।
सायक न होता मृग न मरता ।
देखो कैसा हुआ प्रभात है ।
सायक दो हर बेटे को,जो है इसके लायक ।
एक बालि का वध प्रर्याप्त नहीं है ।
एक रावण के वध से पूरा पाप समाप्त नहीं है ।
एक ही कंस यहां नहीं है ।
दु:शासन गिनते थक जाओगे ।
आज की आवश्यकता है हर हाथों में सायक ।
आत्म रक्षा के लिए सायक जरुरी ।
परहित साधना सायक जरुरी ।
होंगे हथियार हाथों में ।
अनहोनी घटना रुक जाये ।
बन जाए फिर हर कोई ,रघुनायक ।
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